“अगर दस सेकंड में जवाब नहीं दे सकते, तो वह फ़्लैशकार्ड नहीं, स्लाइड है।”
एक ही लेक्चर से 180 कार्ड बने हैं, आप हफ़्ते भर रोज़ दोहराते हैं, और एग्ज़ाम में फिर भी जवाब नहीं दे पाते। मैंने पूरा एक सेमेस्टर यही किया, तब जाकर समझ आया कि दिक़्क़त कार्डों में थी, मुझमें नहीं।
मेरे बनाए लगभग हर ख़राब डेक की वजह एक ही थी। मैं स्लाइड्स पढ़ते-पढ़ते कार्ड बनाता था, हर बुलेट पर एक, और कभी यह पूछा ही नहीं कि यह कार्ड रखने लायक़ है भी या नहीं।
बुलेट से बने कार्ड में ग़लत क्या है
तीन चीज़ें बिगड़ती हैं, और एक बार पता चल जाए तो पहचानना आसान है।
कार्ड कुछ पूछता ही नहीं। आगे लिखा है "ऑस्मोसिस"। पीछे पूरी स्लाइड। वहाँ कोई सवाल है ही नहीं, तो सही या ग़लत होने की गुंजाइश भी नहीं। आप पलटते हैं, पढ़ते हैं, और लगता है कि पढ़ाई हो गई।
आप कार्ड याद कर लेते हैं, बात नहीं। अगर जवाब हमेशा तीसरा बुलेट होता है, या लंबे पीछे वाला कार्ड हमेशा सक्रिय परिवहन का ही होता है, तो आप कार्ड को ही पहचानने लगते हैं। यह तब तक बढ़िया चलता है जब तक एग्ज़ाम वही बात दूसरे शब्दों में न पूछ ले।
एक ही कार्ड पर पूरी लिस्ट है। "माइटोसिस की चार अवस्थाएँ बताइए।" तीन याद आती हैं, आप पलटते हैं, कहते हैं "चलो लगभग सही", और आगे बढ़ जाते हैं। आपने अभी उस चीज़ को सही मान लिया जो आती नहीं थी।
अब मैं यह नियम इस्तेमाल करता हूँ
एक सवाल, एक जवाब, क़रीब दस सेकंड में देने लायक़।
बस इतना। इससे ज़्यादा लगे तो कार्ड बहुत कुछ समेट रहा है, उसे तोड़ दीजिए। सवाल न हो तो वह अभी कार्ड बना ही नहीं।
दस सेकंड वाली बात जितनी लगती है उससे ज़्यादा मायने रखती है। यही फ़र्क़ है उस कार्ड में जिस पर आप सच में ग़लत हो सकते हैं और उस कार्ड में जिसे आप बस देखकर निकल जाते हैं।
पहले दौर के बाद बनाइए, दौरान नहीं
मेरे डेक में सबसे बड़ा बदलाव इसी से आया।
पढ़ते हुए कार्ड बनाना काम जैसा लगता है क्योंकि कुछ बन रहा होता है। पर उस वक़्त आपको पता ही नहीं होता कि कौन सा हिस्सा मुश्किल है, तो आप हर चीज़ का कार्ड बना देते हैं, और ज़्यादातर उन चीज़ों के होते हैं जो पहले से आती थीं।
पहले एक स्मरण-दौर कीजिए। एक हिस्सा पढ़िए, बंद कीजिए, जो याद है लिखिए, फिर देखिए क्या छूटा। अब आपको ठीक-ठीक पता है कि क्या फिसलता रहता है, और कार्ड वही हैं। बाक़ी सब स्लाइड्स में ही रह सकता है।
उस दौर के बारे में विस्तार से पहली पोस्ट में लिखा है। दिन 5 पर कार्ड आते हैं, और यह जान-बूझकर है।
दोहराने लायक़ कार्ड कैसे लिखें
बयानों को सवालों में बदलिए। "माइटोकॉन्ड्रिया ATP बनाता है" से बनेगा "माइटोकॉन्ड्रिया क्या बनाता है, और किससे?"
क्यों और कैसे पूछिए, सिर्फ़ क्या नहीं। "सक्रिय परिवहन क्या है" एक परिभाषा है जो बिना समझे भी सुनाई जा सकती है। "सक्रिय परिवहन को ऊर्जा क्यों चाहिए जबकि विसरण को नहीं" वही है जिस पर असल में नंबर मिलेंगे।
जवाब अपने शब्दों में लिखिए। स्लाइड की पंक्ति चिपका दी तो आप बस यह जाँच रहे हैं कि वह वाक्य पहचान पाते हैं या नहीं। ख़ुद लिखेंगे तो पहले समझना पड़ेगा, और असली फ़ायदा तो उसी में है।
आगे की तरफ़ संदर्भ दीजिए। जवाब में अकेला "1815" किसी काम का नहीं अगर याद ही न रहे कि छह तारीख़ों में से कौन सी थी।
आपको सोच से कहीं कम कार्ड चाहिए
जिस लेक्चर से 180 कार्ड निकलते हैं, उसमें आमतौर पर क़रीब 25 ही मायने रखते हैं। बाक़ी वे चीज़ें हैं जो आपको आती हैं, वे जो कभी पूछी नहीं जाएँगी, और एक ही बात जाँचते तीन अलग कार्ड।
जिस डेक को खोलने का मन ही न करे वह दोहराया नहीं जाता, तो छोटा और ईमानदार डेक बड़े और पूरे डेक से हमेशा बेहतर है।
साथ-साथ छाँटते चलिए। कोई कार्ड लगातार तीन बार सही हो गया तो उसे निकाल दीजिए। अब वह कुछ सिखा नहीं रहा, बस डेक को बड़ा दिखा रहा है।
फ़्लैशकार्ड क्या नहीं कर सकते
कार्ड तथ्यों, परिभाषाओं, सूत्रों, तारीख़ों और शब्दावली के लिए अच्छे हैं, यानी उन चीज़ों के लिए जिनका एक सही जवाब होता है।
समझ के लिए वे कमज़ोर हैं। अगर एग्ज़ाम पूछे कि कोई चीज़ क्यों होती है, या दो प्रक्रियाओं की तुलना करने को कहे, तो कोई कार्ड नहीं बचाएगा, क्योंकि सारे टुकड़े आते हुए भी उन्हें बोलकर जोड़ पाना अलग बात है।
उसके लिए पूरे वाक्यों में समझाना पड़ता है, किसी को या ख़ुद को। कार्ड और समझाना दो अलग औज़ार हैं और दोनों चाहिए।
टूल कहाँ मदद करता है और कहाँ नहीं
उतारना ही उबाऊ हिस्सा है। स्लाइड पढ़कर वही बात कार्ड में टाइप करने से समझ में कुछ नहीं जुड़ता, और ठीक यही हिस्सा सॉफ़्टवेयर कर सकता है। Leurons आपकी स्लाइड्स से एक बार में कार्ड बना देता है, तो टाइप करने वाला वह घंटा बच जाता है।
जो वह आपके लिए नहीं कर सकता वह है यह तय करना कि ज़रूरी क्या है। डेक में से गुज़रना, जो आता है उसके कार्ड हटाना, और जिनका जवाब पूरा पैराग्राफ़ है उन्हें दोबारा लिखना, यह आपको ही करना है। दस मिनट का काम है, और वही दस मिनट डेक को दोहराने लायक़ बनाते हैं।
छोटी बात
हर बुलेट का कार्ड मत बनाइए। कार्ड तब बनाइए जब पता चल जाए कि आप कहाँ ग़लत होते हैं। एक सवाल, एक जवाब, दस सेकंड। जो लगातार तीन बार सही हो, उसे हटा दीजिए।
25 कार्डों का डेक जिसे आप सच में दोहराएँगे, 180 वाले उस डेक से बेहतर है जिसे नहीं दोहराएँगे।